श्लोक 53
श्लोक 53
इमां पीयूषलहरीं जगन्नाथेन निर्मिताम् ।
यः पठेत्तस्य सर्वत्र जायन्ते सुखसम्पदः ।। 53 ।।
पीयूषलहरी ऐशा । जगन्नाथेचि
निर्मिल्या
म्हणे त्यांस सदा लाभे । संपत्ती, सौख्य पूर्णता ।।
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सुदीर्घ गंगालहरी मनोज्ञा । वाचून हो हर्ष ‘अरुंधतीला’ ।
येई तिला जी अनुभूति चित्ता । ती देतसे ती रसिकांस सार्या ।।
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